कैथल, 6 अगस्त। जिले में धान की फसल में बौनापन रोग (Rice Dwarf Disease) की आशको देखते हुए कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी है। उप कृषि निदेशक डॉ. रविंद्र हुड्डा की अध्यक्षता में विभाग की संयुक्त टीम ने विभिन्न क्षेत्रों में धान की फसल का सर्वेक्षण किया और किसानों को रोग की पहचान तथा बचाव के उपायों की जानकारी दी।
डॉ. रविंद्र हुड्डा ने बताया कि धान का बौनापन रोग एक वायरस जनित बीमारी है, जिसका प्रसार मुख्य रूप से सफेद पीठ वाले तेले (White Backed Plant Hopper) के माध्यम से होता है। इस रोग से प्रभावित पौधे सामान्य पौधों की तुलना में काफी छोटे रह जाते हैं। संक्रमित पौधों की पत्तियां गहरे हरे रंग की हो जाती हैं, कल्लों का विकास रुक जाता है तथा जड़ें भूरे रंग की और अविकसित हो जाती हैं, जिससे पौधे पोषक तत्व और पानी का पर्याप्त अवशोषण नहीं कर पाते।
उन्होंने किसानों से अपील की कि वे अपनी धान की फसल का नियमित निरीक्षण करें। यदि खेत में कोई संक्रमित पौधा दिखाई दे तो उसे तुरंत उखाड़कर मिट्टी में गहराई से दबा दें, ताकि संक्रमण अन्य पौधों तक न फैले।
कृषि विभाग ने किसानों को खेत में बारी-बारी से सिंचाई और सुखाने (Alternate Wetting and Drying) की तकनीक अपनाने की सलाह भी दी है, जिससे कीटों का प्रकोप कम किया जा सकता है।
सफेद पीठ वाले तेले की रोकथाम के लिए दवा
कृषि विभाग के अनुसार सफेद पीठ वाले तेले की रोकथाम के लिए किसान निम्न दवाओं का प्रयोग कर सकते हैं—
- पाइमैट्रोजिन (Chess 50 WP) – 120 ग्राम प्रति एकड़
- डाईनोटिफ्यूरान (Oshin 20 SG) – 80 ग्राम प्रति एकड़
इन दवाओं को 200 लीटर पानी में मिलाकर पौधों के तनों के निचले भाग पर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
डॉ. रविंद्र हुड्डा ने कहा कि किसान धान में बौनापन रोग या अन्य किसी भी फसल संबंधी समस्या के समाधान के लिए कृषि विभाग के अधिकारियों से संपर्क करें तथा विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग करें।
इस अवसर पर सहायक पौधा संरक्षण अधिकारी डॉ. कुलदीप सिंह और कृषि विकास अधिकारी बलबीर सिंह भी मौजूद रहे।
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