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महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय में ‘विभाजन विभीषिका’ पर विचार गोष्ठी, भावुक हुए उपस्थितजन

कैथल: महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय के टीक परिसर में ‘विभाजन विभीषिका’ विषय पर विशेष व्याख्यान एवं विमर्श सत्र का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राजेन्द्रकुमार अनायत ने की। कार्यक्रम में 1947 के भारत विभाजन की त्रासदी को झेलने वाले परिवारों के सदस्यों ने अपने पूर्वजों के मार्मिक संस्मरण साझा किए, जिससे सभागार का माहौल भावुक हो गया।

विभाजन की पीड़ा के संस्मरण सुन भावुक हुआ सभागार

कार्यक्रम का सबसे संवेदनशील क्षण उस समय आया जब विश्वविद्यालय के वित्ताधिकारी श्री कृष्ण कुमार भारती एवं श्री कमल आनन्द ने अपने दादा-दादी और पूर्वजों से सुनी विभाजन की हृदयविदारक आपबीती साझा की। उन्होंने बताया कि 1947 के खूनी दौर में उनके परिवारों को पुश्तैनी जमीन, लहलहाते खेत और बने-बनाए घर रातों-रात छोड़कर जान बचाने के लिए पलायन करना पड़ा।

उन्होंने बताया कि मीलों पैदल यात्रा के दौरान रक्तपात और लूटपाट का भय बना रहा। अनेक परिवारों ने अपनों को अपनी आंखों के सामने बिछड़ते और दम तोड़ते देखा। भारत पहुंचने के बाद शरणार्थी शिविरों में भुखमरी, महामारी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के बीच उनके बुजुर्गों ने जीवन को दोबारा शून्य से शुरू किया।

कुलगुरु प्रो. राजेन्द्रकुमार अनायत ने दोनों अधिकारियों को मंच पर शॉल एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया और उनके पूर्वजों के संघर्ष, साहस एवं धैर्य को नमन किया।

‘विभाजन का घाव आज भी नहीं भरा’

अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलगुरु प्रो. राजेन्द्रकुमार अनायत ने डिजिटल प्रस्तुति (पीपीटी) के माध्यम से स्वाधीनता आंदोलन, औपनिवेशिक नीतियों और भारत विभाजन की परिस्थितियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि देश राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो गया, लेकिन वैचारिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से पूर्ण स्वतंत्रता की दिशा में अभी भी प्रयास आवश्यक हैं।

प्रो. अनायत ने कहा कि अंग्रेज जाते-जाते भारत को खंडित कर ऐसा गहरा घाव दे गए, जिसका दर्द दशकों बाद भी महसूस किया जाता है। उन्होंने विभाजन के दौरान हुए व्यापक विस्थापन, जनहानि, संसाधनों के बंटवारे, जबरन मतांतरण और परिवारों के टूटने को मानव इतिहास की बड़ी त्रासदियों में से एक बताया।

उन्होंने युवा पीढ़ी से आह्वान किया कि देश की एकता और अखंडता को मजबूत बनाए रखने का संकल्प लें, ताकि भविष्य में ऐसी मानवीय त्रासदी की पुनरावृत्ति न हो।

वक्ताओं ने विभाजन की ऐतिहासिक पीड़ा को किया याद

विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. संजय गोयल ने कहा कि विभाजन केवल राजनीतिक सीमाओं का बंटवारा नहीं था, बल्कि करोड़ों निर्दोष लोगों की असहनीय पीड़ा की गाथा भी था।

शैक्षणिक अधिष्ठाता डॉ. जगत नारायण कौशिक ने कहा कि 1947 में केवल भू-भाग नहीं बंटा, बल्कि परिवार, रिश्ते और संवेदनाएं भी खंडित हुईं। हिन्दू अध्ययन विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्ण चन्द्र पाण्डेय ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के बलिदानों और विभाजन की विभीषिका को याद रखना जरूरी है, ताकि इतिहास से सीख लेकर देश की एकता को अक्षुण्ण रखा जा सके।

विद्यार्थियों को दिखाई गई विभाजन पर आधारित लघु फिल्म

कार्यक्रम के दौरान जनसंपर्क अधिकारी डॉ. गोविन्द वल्लभ ने देशभक्ति गीत प्रस्तुत किया। विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को ‘विभाजन विभीषिका’ पर आधारित वृत्तचित्र भी दिखाया गया। इसमें 1947 के दौर के संघर्ष, शरणार्थी शिविरों की परिस्थितियों और पलायन के कारुणिक दृश्यों को प्रदर्शित किया गया।

कार्यक्रम का संचालन दर्शन विभाग के सहायक आचार्य डॉ. कुलदीप चन्द्र ने किया, जबकि परीक्षा नियंत्रक प्रो. भाग सिंह बोदला ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

इस अवसर पर डॉ. सुरेन्द्र पाल वत्स, वेद विभागाध्यक्ष डॉ. अखिलेश कुमार मिश्र, ज्योतिष विभागाध्यक्ष डॉ. नरेश शर्मा, व्याकरण विभागाध्यक्षा डॉ. शर्मिला, योग विभाग प्रभारी डॉ. रामानन्द मिश्र, डॉ. नवीन शर्मा, डॉ. चन्द्रकान्त, डॉ. हरीश कुमार, श्री रोहित सहित विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, अधिकारी, कर्मचारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे।

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महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय में ‘विभाजन विभीषिका’ पर विचार गोष्ठी

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महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय में ‘विभाजन विभीषिका’ पर विचार गोष्ठी हुई। विभाजन पीड़ित परिवारों ने मार्मिक संस्मरण साझा किए और 1947 की त्रासदी को याद किया।

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