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कैथल में पंचनद शोध संस्थान की गोष्ठी, ऋतुचर्या और खान-पान पर डॉ. जितेंद्र गिल ने बताए स्वस्थ जीवन के आयुर्वेदिक सूत्र

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कैथल में पंचनद शोध संस्थान की गोष्ठी: ऋतुचर्या और खान-पान पर डॉ. जितेंद्र गिल ने बताए स्वस्थ जीवन के आयुर्वेदिक सूत्र

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कैथल में पंचनद शोध संस्थान की मासिक गोष्ठी में आयुर्वेदिक मेडिकल ऑफिसर डॉ. जितेंद्र गिल ने ऋतुचर्या, खान-पान, आयुर्वेद और स्वस्थ जीवनशैली पर विस्तार से जानकारी दी।

कैथल, 23 जुलाई 2026। पंचनद शोध संस्थान, कैथल अध्ययन केंद्र की ओर से विवेकानंद जिला लाइब्रेरी, पेहवा चौक में आयोजित मासिक गोष्ठी में ‘ऋतुचर्या एवं खान-पान’ विषय पर विशेषज्ञों ने भारतीय आयुर्वेद परंपरा, मौसमी आहार और स्वस्थ जीवनशैली के महत्व पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता आयुर्वेदिक मेडिकल ऑफिसर डॉ. जितेंद्र गिल रहे।

डॉ. जितेंद्र गिल ने कहा कि भारतीय संस्कृति में खान-पान और जीवनशैली हमेशा ऋतु के अनुरूप निर्धारित रही है। हमारे पूर्वज मौसम के अनुसार आहार-विहार अपनाते थे, जिससे शरीर प्राकृतिक रूप से संतुलित और स्वस्थ बना रहता था। उन्होंने बताया कि वर्षा ऋतु में वात दोष का प्रभाव बढ़ने से जोड़ों के दर्द और अन्य शारीरिक समस्याएं बढ़ सकती हैं। ऐसे समय में तिल के तेल से बने व्यंजन तथा ऋतु के अनुरूप खाद्य पदार्थों का सेवन लाभकारी माना गया है।

उन्होंने आयुर्वेद के वात, पित्त और कफ सिद्धांत की व्याख्या करते हुए कहा कि शरीर की प्रकृति, आयु और दिनचर्या के अनुसार इनका प्रभाव बदलता रहता है। बच्चों में कफ की प्रधानता विकास में सहायक होती है, जबकि पित्त सक्रियता, नेतृत्व क्षमता और तेज बुद्धि से जुड़ा माना जाता है। बढ़ती उम्र के साथ वात का प्रभाव अधिक होने पर जोड़ों से संबंधित समस्याएं बढ़ सकती हैं।

डॉ. गिल ने कहा कि आयुर्वेद हजारों वर्षों के अनुभव और शोध पर आधारित चिकित्सा पद्धति है। वहीं आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी निरंतर शोध और नए निष्कर्षों के माध्यम से आगे बढ़ रहा है। इसलिए किसी भी चिकित्सा पद्धति का विरोध करने के बजाय उसकी उपयोगी और प्रभावी बातों को अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि एलोपैथी और आयुर्वेद दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं और समाज को दोनों के सकारात्मक पक्षों का लाभ उठाना चाहिए।

उन्होंने वर्षा ऋतु में खान-पान में विशेष सावधानी बरतने की सलाह देते हुए कहा कि मौसम के अनुसार उपलब्ध फलों और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। जामुन जैसे मौसमी फलों का उल्लेख करते हुए उन्होंने भारतीय जीवनशैली में मौसमी आहार की परंपरा को वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया।

डॉ. गिल ने उपवास, प्राकृतिक जीवनशैली और ऋतु के अनुरूप आहार को भारतीय चिकित्सा परंपरा का अभिन्न हिस्सा बताते हुए कहा कि स्वस्थ जीवन केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने लोगों से अपनी समृद्ध परंपराओं और आयुर्वेदिक ज्ञान को आधुनिक जीवनशैली के साथ संतुलित रूप से अपनाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. मनोज भांबू ने की। इस अवसर पर पंचनद शोध संस्थान के अध्यक्ष डॉ. अशोक अत्रि, डॉ. मोनिका जाखड़, सीए मनोज गर्ग, डॉ. गोविंद वल्लभ, डॉ. रविंद्र जांगड़ा, डॉ. नवीन, डॉ. रोहित, डॉ. अनुराग सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

गोष्ठी का उद्देश्य भारतीय जीवन-पद्धति, आयुर्वेद और ऋतु के अनुरूप खान-पान के महत्व के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाना तथा पारंपरिक स्वास्थ्य ज्ञान को आधुनिक जीवन में उपयोगी रूप से अपनाने के लिए प्रेरित करना रहा।

Focus Keywords:
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